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दौलतमंद आदमी को न तो दोस्तों की कमी होती है , न मददगारों की। दौलतमंद आदमी के हजार दोस्त होते हैं। लेकिन सच्ची दोस्ती की परख तब होती है , जब जान जोखिम में हो और जेब में फूटी कौड़ी तक न हो। अमर की तो न जान जोखिम में थी , न जेबें रुपयों से खाली। शायद इसीलिये दोस्तों की परख में उसे सिर्फ और सिर्फ नाकामी हासिल हुई। दौलतमंद होते हुए भी अमर को पूरा भरोसा था कि उसके दोस्त सच्चे थे , वे सिर्फ दौलत की वजह से उसके साथ नहीं थे। लेकिन वक्त और हालात के साथ परिस्थितियां बदली और साबित हो गया कि उसके दोस्त सिर्फ दौलत की वजह से उसके साथ थे। बस , दोस्ती में टूटकर अमर ने खुद को नशे में डूबो दिया और तबाही की ओर बढा दिये अपने कदम। दौलत , दोस्ती , फर्ज और परोपकार के मिले जुले रंग लिये हुए एक अनूठी कहानी !

1 REVIEW FOR AUCTOR GRAVIDA ENIM

ADMIN – March 23, 2015

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